स्त्री पुरुष के भाग्य की निर्मात्री है
स्त्री का पहला काम है- पति को पूर्णता देना। उसके सौम्य स्वरूप को संतुलित करना, ताकि उसका अहंकार और आक्रामकता कम हो सके। एक उसके पास प्रेम है, मीठी वाणी है। पुरुष के पास इसका प्रत्युत्तर नहीं होता।
विवाह का सूक्ष्म और आध्यात्मिक आयाम
जिस प्रकार पत्नी विवाह के दौरान पति के हृदय (सूक्ष्म/परा प्रकृति) से युक्त होती हैं, पुरुष भी यदि सूक्ष्म को छू ले तो दोनों आत्मा के प्रखर धरातल पर जुड़ सकते हैं। खेद यही है कि शिक्षा ने दोनों के ही सूक्ष्म धरातल को आवरित कर दिया । शिक्षा में सब कुछ बाहरी विश्व ही है, भीतर की चर्चा ही नहीं है। तब किसी भी परिवार में जीवात्मा कैसे जी सकता है। दो पशु शरीर तीसरा पशु ही पैदा कर सकते हैं।
ब्रह्म, माया और पत्नी की भूमिका
सृष्टि में एकमात्र तत्त्व है- ब्रह्म । दूसरा कोई नहीं । ब्रह्म सत्य है, बाकी सब ऋत है। ब्रह्म के विस्तार की कामना ने सोम को आपः बना दिया- अपने स्वेदन से। कामना ब्रह्म के मन का बीज है। पत्नी भी पुरुष के मन का बीज है। वह पुरुष मन की कामना है- विस्तार के लिए आती है।
स्त्री ही पुरुष के भाग्य की निर्मात्री है। ब्रह्म कर्ताभाव नहीं है। माया ही ऊर्जा है, कर्ता है। आज कितने पुरुष इस बात को जानते हैं कि विवाह बच्चे पैदा करने का उपक्रम मात्र नहीं है। यही वह मार्ग है जिससे पत्नीरूपा ‘माया’ उसके भाग्य का निर्माण करने आती है।
स्त्री पुरुष को भी जन्म देती है और देवता को भी जन्म दे सकती है। पुरुष स्त्री स्थूल या सूक्ष्म जिस शरीर से सम्बद्ध होकर जीते हैं, वैसे ही परिणाम पाते हैं। हम परा प्रकृति से जुड़ेंगे, तो स्थूल (क्षर सृष्टि) सृष्टि होगी।

सोम-अग्नि का प्रतीक और पति-पत्नी का संबंध
पुरुष भीतर सोम तो है, किन्तु निर्बल है। अग्नि की प्रधानता ही पत्नी का आकर्षण है। सोम जैसे अग्नि के पास आता है, आहुत होने और समा जाता है। अग्नि में नया निर्माण करने। नया निर्माण ही अग्नि का भाग्य है।
पत्नी के बारे में चिन्तन अल्प रहता है। उसकी भूमिका तो दिखाई देती है, किन्तु स्वयं का दायित्वबोध अल्प रह जाता है। दूसरी ओर स्त्री तो इस घर में आती ही उसके लिए है। भीतर आग्नेय होने से संकल्पवान भी रहती है। उसका चित्त सदा पति के साथ ही जुड़ा रहता है। सभी कर्म उसी के लिए।
पत्नी का समर्पण और तैयारी
स्त्री विवाह पूर्व ही भावी जीवन की योजना बनाती जाती है। उसे नहीं मालूम होता कि किसके साथ जीना है, कैसा होगा उनका स्वभाव, उनकी परम्परा, जीवन के प्रति दृष्टिकोण क्या होगा। ईश्वर से प्रार्थना करती रहती है। स्वयं को श्रेष्ठ महिला के रूप में तैयार करती रहती है।
स्त्री स्वयं भी अपने जीवनसाथी को कैसा देखना चाहती है, ये सपने भी संजोती जाती है। इस कल्पना से उसका आत्मबल उस दृष्टि से तैयार हो जाता है। विवाह के बाद पहले दिन से ही वह अपने काम में लग जाती है। उसे अन्तर्मन के स्तर पर बहुत शीघ्र जीवनक्रम का आभास हो जाता है। बदलना उसी को पड़ता है।
उसे अपने पति के व्यक्तित्व और दृष्टिकोण का आकलन करना है। उसकी मूर्ति गढ़नी है। पति के साथ रहकर पत्नी स्वयं पर कभी केन्द्रित नहीं रहती । वह पति के आत्मा के साथ सूक्ष्म स्तर पर होती है। पति को इस स्तर का आभास तक नहीं हो पाता।
आधुनिक चुनौतियां और सच्चाई
पति का आग्नेय स्वरूप एक ही तथ्य पर आश्रित रहता है- मैं इसका पति हूं। इसे मेरी आज्ञा के साथ जीना है, मेरा ध्यान रखना है। भीतर की दुर्बलता ही उसकी शत्रु होती है । उसका व्यवहार पूर्णतः एकपक्षीय होता है।
आज तो ‘शराब’ एक तत्त्व दोनों के बीच दीवार बनता जा रहा। तब वह कहां से जीवन में अर्द्धनारीश्वर को समझ पाएगा ! कहां पत्नी को अपना भाग्य विधाता समझ पाएगा। आज जो कुछ स्त्रियों के साथ ससुराल में हो रहा है, दर्दनाक है।
सम्पन्न और शिक्षित परिवारों में पत्नी स्वयं को एक स्वतंत्र इकाई मानकर ही जीती है। पति से कॅरियर कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता। समझौता पति को ही करना पड़ता है। तब दोनों को ही भाग्य की मार खानी पड़ जाती है। वे कमाई को ही भाग्य मानते हैं।
पत्नी के दो प्रमुख कार्य
स्त्री का पहला काम है- पति को पूर्णता देना। उसके सौम्य स्वरूप को संतुलित करना ताकि उसका अहंकार और आक्रामकता कम हो सके। एक उसके पास प्रेम है, मीठी वाणी है। पुरुष के पास इसका प्रत्युत्तर नहीं होता । मौन धारण करने की बात है।
दूसरा काम है- अन्न ब्रह्म का उपयोग लोग भोजन का उपयोग पेट भरने मात्र के लिए करते हैं। पत्नी अन्न के साथ भावनाओं का सम्प्रेषण करती है। नकारात्मक व्यवहार की चर्चा सीधे नहीं होती । मूर्ति स्वरूप ग्रहण करने लगती है। तब वह बच्चों के साथ भी जुड़ता है, माता-पिता के साथ भी।
निष्कर्ष
मां के संस्कारों पर ही निर्भर करेगा कि पत्नी कहां तक सफल होगी। पत्नी माता दोनों ही माया के प्रतिबिम्ब हैं। दोनों का एक ही लक्ष्य होता है- पुरुष के साथ प्रारब्ध को भोगना । पुरुष का प्रारब्ध इन्हीं के द्वारा अभिव्यक्त होता है, पोषित होता है, भोग रूप प्राप्त होता है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।