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नवरात्रि: नारी के नौ रूप, मां दुर्गा के नौ स्वरूप – देवी दुर्गा से सीखें जीवन के सूत्र

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

देवी के स्वरूप में जो नारी शक्ति आज इस जगत में विद्यमान है उन्हें अपने स्थान पर प्रतिष्ठित कर उनकी गरिमा को बनाए रखें। हर नारी है शक्ति।

क्या है शक्ति का वास्तविक स्वरूप?

हर व्यक्ति में एक अनंत शक्ति निवास करती है, जो ब्रह्माण्ड का मूल है। यह अनंत शक्ति दो रूपों में रहती है एक प्रकट रूप में और दूसरी अन्तर्निहित क्षमता के रूप में। यह अनंत शक्ति हर एक में सुप्तावस्था में रहती है। जब एक बार यह जाग्रत हो जाती है, तो हमारा आध्यात्मिक विकास निश्चित है, जो मानव को उसके दिव्य स्रोत की ओर वापस ले जाती है।

यह माना जाता रहा है कि मानव शरीर और पृथ्वी की रचना समान तरीके से ही हुई है। दोनों में ही एक धुरी होती है। मानव की धुरी है, रीढ की हड्डी यानी मेरुदण्ड, जो उसकी गतिविधियों और कार्यों का संतुलन करती है। इस धुरी से लगे हुए कई स्पंदनशील केंद्र होते हैं, जो जीवन की आदि ध्वनि को पूरे ब्रह्माण्ड में प्रतिध्वनित करते हैं या कुछ गलत होने पर चेतावनी का संकेत भी देते हैं। वास्तव में यह केंद्र कुण्डलिनी योग में वर्णित चक्रों से ही संबंधित है और कुण्डलिनी में जागृति के लिए शक्ति की ही उपासना के बारे में बताया गया है। शक्ति से ही जगत और ब्रह्माण्ड का अस्तित्व है। शक्ति से ही समस्त सृष्टि और समष्टि है। वास्तविकता में यही नवरात्र शक्ति है, जिसमें अपने अंदर की ऊर्जा को पहचानकर बाहरी ऊर्जा से समन्वय आवश्यक है।

देवी दुर्गा सजग हैं, सक्षम हैं, सत्य की पक्षधर हैं, प्रगतिशील हैं, आवश्यकता होने पर अत्यंत क्रूर और अतिशय दयालु भी हैं। इस जगत में मां दुर्गा की सभी विशेषताएं स्त्री में पाई जाती हैं। मां के नौ स्वरूपों का दर्शन हर नारी शक्ति में देखने को मिलता है।

नारी के नौ रूप: मां दुर्गा के नौ स्वरूप

Navratri Naari Ke Nau Roop Maa Durga Ke Nau Swaroop
Navratri Naari Ke Nau Roop Maa Durga Ke Nau Swaroop

1. शैलपुत्री: कन्या का बाल स्वरूप

आद्या शक्ति का प्रथम स्वरूप माना जाता है। जब स्त्री का जन्म होता है तो वह बाल्यकाल में अपने माता-पिता के स्नेह से पुष्पित व पल्लवित होती रहती है, उस समय जो कन्या का स्वरूप होता है वही मां शैलपुत्री का स्वरूप है। कन्या बाल लीला कर मोहित करती है। उसकी प्रसन्नता से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

2. ब्रह्मचारिणी: तपस्विनी नारी

ब्रह्म चारयितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी । शिव को पाने हेतु मां पार्वती ने तप किया था, इस कारण वह तपस्विनी स्वरूपा है। स्त्री भी इसी तरह किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उपवास, धार्मिक कर्मों में रत रहती हैं। परिवार के कल्याण के लिए जप-तप में लीन रहती हुई, तपस्या में संलग्न आज की नारी में मां ब्रह्मचारिणी शक्ति का स्वरूप परिलक्षित होता है।

3. चन्द्रघण्टा: ओजस्वी एवं पराक्रमी स्त्री

चन्द्रः घण्टायां यस्याः सा चन्द्रघण्टा । आह्लादकारी चन्द्रमा जिनकी घण्टा में स्थित हों, उन देवी का नाम ‘चन्द्रघण्टा’ है। माता के सिर पर अर्धचंद्र स्वरूप विद्यमान है। जब स्त्री मंगल सूचक आभूषण या कोई चिन्ह धारण करती है तो उसकी ध्वनि एवं उत्साह के घण्टानाद से ही शत्रु परास्त हो जाते हैं। उसका ओजस्वी स्वरूप साक्षात् चन्द्रघण्टा देवी का है।

4. कूष्माण्डा: गर्भवती स्त्री का स्वरूप

त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है, वे भगवती ‘कूष्माण्डा’ कहलाती हैं। संपूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति मां कूष्माण्डा के उदर से हुई। सृष्टि करने एवं जन्म देने की शक्ति भी स्त्री में ही होती है, गर्भवती स्त्री कूष्माण्डा देवी के स्वरूप में वंदनीय है। गर्भवती की प्रसन्नता में माता कूष्माण्डा की प्रसन्नता प्रतीत होती है।

5. स्कन्दमाता: संतान का पोषण करती माता

कार्तिकेय की माता होने से शक्ति ‘स्कन्दमाता’ कहलाती हैं। मातृस्वरूपा की आराधना से स्वतः सभी सिद्धियां प्राप्त होती है। प्रत्येक स्त्री जो किसी बालक को जन्म देती है तथा उसका भरण पोषण करती है, स्वयं से पहले अपनी संतान को सुख प्रदान करने का प्रयास करती हैं, ऐसी कामकाजी महिलाओं में स्कन्दमाता का स्वरूप परिलक्षित है।

6. कात्यायनी: संघर्षशील एवं सहायक स्त्री

देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई। महर्षि ने उन्हें अपनी कन्या माना, इसलिए ‘कात्यायनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। स्त्री जब अपने परिवार, मित्र जनों एवं सहयोगियों की मदद करते हुए स्वयं संघर्षों से जूझती है तथा विजय को प्राप्त करती है तो इस पराक्रम में कात्यायनी का स्वरूप झलकता है।

7. कालरात्रि: रौद्र रूप में स्त्री

काल या बुरी शक्तियों का नाश करने वाली होने के कारण इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। जब एक नारी के परिवार में पति या संतान पर कोई आपत्ति आती है तो वह स्वयं कठिनाइयों का सामना करती हुई, स्वयं के प्रति हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाती है। वह इस अदम्य साहस एवं रौद्र रूप में साक्षात कालरात्रि है।

8. महागौरी: सफलता प्राप्त करती स्त्री

जब शक्ति ने तपस्या द्वारा गौरवर्ण प्राप्त किया था जब शक्ति ने तपस्या द्वारा गौरवर्ण प्राप्त किया था जब अपने ध्येय को प्राप्त करने के लिये तपस्या, अनुष्ठान पूर्ण कर या कठोर संघर्ष कर अपने उद्देश्य को प्राप्त करती है या किसी पद पर आसीन होकर कीर्ति व सम्मान प्राप्त करती है, तो महागौरी स्वरूपा प्रतीत होती है।

9. सिद्धिदात्री: आशीष और अभय देती माता

सिद्धि अर्थात् मोक्ष प्रदान करने वाली होने के कारण देवी का नाम ‘सिद्धिदात्री’ है। इनको सभी सिद्धियां प्रदान करने वाली कहा जाता है। जब स्त्री माता के स्वरूप में आशीष और अभय का दान प्रदान करती है, अपने हृदय से परिवार जनों, सुहृदजनों (मित्र) को आशीर्वाद दे मार्ग प्रदर्शित करती है तो सिद्धिदात्री प्रतीत होती है।

नवरात्र का संदेश: नारी को पहचानें, नारी को सम्मान दें

देवी के स्वरूप में जो नारी शक्ति आज इस जगत में विद्यमान है उन्हें अपने स्थान पर प्रतिष्ठित कर उनकी गरिमा को बनाए रखना ही सच्ची नवरात्रि है। हर नारी में मां दुर्गा के सभी नौ स्वरूप समाहित हैं – बालिका से लेकर युवती तक, गृहिणी से लेकर कामकाजी महिला तक, संतान को जन्म देने वाली माँ से लेकर परिवार की रक्षा करती वीरांगना तक।

नवरात्रि के इन पावन दिनों में संकल्प लें कि हर नारी को सम्मान देंगे, उसकी शक्ति को पहचानेंगे और उसे उसके उचित स्थान पर प्रतिष्ठित करेंगे। यही सच्ची देवी उपासना है।

नवरात्रि में दुर्गा चालीसा का पाठ करने से सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं।